
Ranikhet: Kiran Bhagat: Aipan: रानीखेत की किरन भगत ने पारंपरिक लोककला ऐपण को न केवल जीवित रखा है, बल्कि इसे आजीविका का सशक्त माध्यम बनाकर आत्मनिर्भरता की मिसाल भी पेश की है। साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाली किरन कठिन पारिवारिक परिस्थितियों के बावजूद अपने हुनर और संकल्प के बल पर आगे बढ़ रही हैं।
किरन के पिता सतीश चंद्र भगत लंबे समय से अस्वस्थ हैं, जिस कारण परिवार की जिम्मेदारी काफी हद तक उनकी मां भगवती देवी पर आ गई, जो दूध बेचकर घर का खर्च चलाती हैं। ऐसे में परिवार को आर्थिक सहारा देने के लिए किरन ने रानीखेत की एक कपड़े की दुकान में काम करना शुरू किया। हालांकि नौकरी के साथ-साथ उनके मन में कुछ अलग करने और आगे बढ़ने की इच्छा लगातार बनी रही।
इसी तलाश ने उन्हें उत्तराखंड की पारंपरिक कला ऐपण से जोड़ा। शुरुआत में इस कला में दक्षता न होने के कारण उन्हें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। यूट्यूब के माध्यम से ऐपण की बारीकियां सीखीं और घर की देहरी, कपड़ों व अन्य सतहों पर अभ्यास करते हुए धीरे-धीरे इस कला में निपुण होती चली गईं।
लगातार मेहनत का परिणाम यह रहा कि पिछले दो वर्षों से किरन ने ऐपण को व्यावसायिक रूप से अपनाया। वहीं, बीते पांच महीनों से सोशल मीडिया पर अपने बनाए ऐपण के फोटो और वीडियो साझा करने के बाद उनके काम को नई पहचान मिलने लगी। आज उन्हें न केवल आसपास के क्षेत्रों से, बल्कि देश के कई बड़े शहरों से ऑर्डर मिल रहे हैं। इतना ही नहीं, उनके उत्पाद अमेरिका तक भी पहुंच चुके हैं।
किरन पारंपरिक और आधुनिक दोनों शैली के ऐपण उत्पाद तैयार कर रही हैं। उनके कार्यों में ऐपण तोरण (दरवाजे और बाइक के लिए), दीवार सजावट, वुडन फ्रेम ऐपण, कैनवास पेंटिंग, पारंपरिक चौक, पूजा चौकी, लक्ष्मी पगचिन्ह, शुभ-लाभ, गणेश और देवी-देवताओं के ऐपण प्रमुख हैं। इसके अलावा दीया स्टैंड, पूजा थाली, करवा चौथ थाली, गृह प्रवेश और विवाह विशेष ऐपण भी उनके लोकप्रिय उत्पादों में शामिल हैं।
किरन भगत की यह यात्रा न केवल युवाओं के लिए प्रेरणादायक है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि अगर इच्छाशक्ति और मेहनत हो, तो पारंपरिक कला भी रोजगार और पहचान का मजबूत माध्यम बन सकती है।






