
देहरादून: भारतीय घरेलू क्रिकेट में इन दिनों एक बड़ा सवाल लगातार उठ रहा है, क्या रणजी ट्रॉफी में शानदार प्रदर्शन करने के बाद भी खिलाड़ी को बड़े स्तर के टूर्नामेंट में मौका मिलना तय है? दलीप ट्रॉफी को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच उत्तराखंड के लेफ्ट आर्म स्पिनर मयंक मिश्रा का मामला इसी बहस का केंद्र बन गया है।
मयंक मिश्रा ने पिछले रणजी ट्रॉफी सीजन में 8 मुकाबलों में 59 विकेट लेकर शानदार प्रदर्शन किया। वह उस सीजन में सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाजों की सूची में शामिल रहे। पिछले दो रणजी सीजन को मिलाकर उनके खाते में 75 विकेट दर्ज हैं, जो किसी भी गेंदबाज के लिए बेहद प्रभावशाली आंकड़ा माना जाता है।
इतना ही नहीं, मयंक उत्तराखंड के लिए घरेलू क्रिकेट में पहली हैट्रिक लेने वाले गेंदबाज भी हैं। सभी प्रारूपों में उन्होंने अब तक 233 विकेट लिए हैं, जो उत्तराखंड क्रिकेट इतिहास में सबसे अधिक हैं। बावजूद इसके, दलीप ट्रॉफी के लिए उन्हें सेंट्रल जोन टीम में केवल स्टैंडबाय खिलाड़ी के रूप में रखा गया है।
यहीं से सवाल खड़े होने लगे हैं। यदि एक गेंदबाज जिसने पूरे सीजन में 59 विकेट लिए हों, रिकॉर्ड बनाए हों और लगातार प्रदर्शन किया हो, उसे अंतिम टीम में जगह नहीं मिलती, तो चयन का पैमाना क्या है? क्रिकेट जानकारों का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में आईपीएल प्रदर्शन को अधिक महत्व मिलने लगा है, जबकि रणजी ट्रॉफी जैसी पारंपरिक घरेलू प्रतियोगिताओं की भूमिका कमजोर होती दिख रही है।
रणजी ट्रॉफी भारतीय क्रिकेट की सबसे प्रतिष्ठित घरेलू प्रतियोगिता मानी जाती रही है। यही वह मंच है जिसने देश को कई दिग्गज खिलाड़ी दिए। लेकिन जब लगातार प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को भी सीमित अवसर मिलते हैं, तो युवा क्रिकेटरों के मन में यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि आखिर लंबे प्रारूप में मेहनत करने का वास्तविक मूल्य क्या है।
मयंक मिश्रा का मामला केवल एक खिलाड़ी की कहानी नहीं, बल्कि भारतीय घरेलू क्रिकेट की बदलती प्राथमिकताओं पर गंभीर चर्चा का विषय बन चुका है।






