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उत्तराखंड: 25 हफ्ते में जन्म, वजन सिर्फ 700 ग्राम…श्रीनगर के डॉक्टरों ने नवजात को दिया नया जीवन

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Premature Baby | Base Hospital Srinagar | NICU Care : समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चों के लिए शुरुआती समय बेहद चुनौतीपूर्ण होता है। शरीर के अंग पूरी तरह विकसित नहीं होने के कारण उन्हें संक्रमण और सांस से जुड़ी कई परेशानियों का खतरा रहता है। ऐसे बच्चों के इलाज में श्रीनगर के राजकीय मेडिकल कॉलेज के बेस चिकित्सालय का बाल रोग विभाग और नीक्कू वार्ड महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

पिछले एक साल में नीक्कू वार्ड में 25 से 30 सप्ताह के बीच जन्मे कई बेहद कम वजन वाले नवजातों का सफल इलाज किया गया है। इनमें पर्वतीय क्षेत्रों से गंभीर हालत में रेफर होकर आए बच्चे भी शामिल हैं। डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ की लगातार निगरानी, वेंटिलेटर सपोर्ट, दवाओं, पोषण और संक्रमण से बचाव के जरिए कई बच्चों को स्वस्थ किया गया।

25 सप्ताह में जन्मा बच्चा, वजन सिर्फ 700 ग्राम

रुद्रप्रयाग के पुनाड़ क्षेत्र की रहने वाली अल्पना नौटियाल के बच्चे का जन्म 16 जून को महज 25 सप्ताह में हुआ था। जन्म के समय बच्चे का वजन केवल 700 ग्राम था। हालत गंभीर होने के कारण उसे बेहतर इलाज के लिए श्रीनगर बेस अस्पताल के नीक्कू वार्ड में भर्ती कराया गया।

करीब दो महीने तक डॉक्टरों की निगरानी और उपचार के बाद बच्चे की हालत में लगातार सुधार हुआ। उसका वजन बढ़कर 1300 ग्राम हो गया और उसने मां का दूध भी लेना शुरू कर दिया। हालत स्थिर होने के बाद डॉक्टरों ने उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी।

बच्चे को स्वस्थ हालत में घर ले जाते समय मां अल्पना भावुक हो गईं। उन्होंने डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ का आभार जताया। परिवार के अनुसार अस्पताल की टीम ने बच्चे की देखभाल के साथ मुश्किल समय में उनका हौसला भी बनाए रखा।

अस्पताल में मनाया गया खास पल

बच्चे के स्वस्थ होकर घर लौटने की खुशी में नीक्कू वार्ड की टीम ने एक खास कार्यक्रम आयोजित किया। बच्चे को ‘नीक्कू ग्रेजुएट’ का नाम दिया गया। उसे कैप और हुड पहनाकर बधाई दी गई और वार्ड में केक भी काटा गया।

इस दौरान बच्चे के पिता और दादी भी भावुक नजर आए। परिवार ने कहा कि चिकित्सकों और नर्सिंग स्टाफ की मेहनत से उनके घर की खुशियां वापस लौटी हैं।

श्रीनगर बेस अस्पताल की यह पहल समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चों के लिए बेहतर नवजात देखभाल की उम्मीद बढ़ाती है। विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे बच्चों को शुरुआती दिनों में विशेष निगरानी और विशेषज्ञ उपचार की जरूरत होती है।

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