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हल्द्वानी:सुना तो था कि जनता के सामाजिक एवं आर्थिक स्तर को ऊँचा करना राजनीति है ।या नागरिक या व्यक्तिगत स्तर पर कोई विशेष प्रकार का सिद्धान्त एवं व्यवहार राजनीति कहलाती है।परन्तु वर्तमान में स्थापित राजनैतिक पृष्ठभूमि भारतीय सभ्यता को तार -तार कर राजनीति की आने वाली पीढ़ी को कौन सी राह पर लेकर जा रही है यह तो इस खेल के बुजुर्ग राजनीतिज्ञ भी नहीं बता सकते । और बतायेंगे भी कैसे जब मुखिया के हाल ही बेहाल हों तो खानदान की साख भला कैसे पनपेगी !सालों से समाज का नेतृत्व कररहे नेताओॆ को यह समझाने की जरूरत तो नहीं है कि जन प्रतिनिधि के रूप में उनके कहे हर शब्द का प्रभाव व्यापक रूप से असरदार है।
हम अकसर बड़े बड़े नेताओं के भाषण में नेता प्रतिपक्ष के खिलाफ कोई ना कोई भद्दी टिप्पणी सुनते हैं।इसी कतार में उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के नैनीताल संसदीय सीट के प्रत्याशी हरीश रावत ने भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी को ‘मैं उज्याड़ खाणी बल्द’ (खेत में खड़ी फसल को चरने वाला बैल) बताया तो शुक्रवार को कोश्यारी ने हरीश रावत को ‘यकलू बानर’ (झुंड से अलग हटकर रहने वाला अकेला बंदर) करार दिया।इस पर रावत की प्रतिक्रिया भी बड़ी दिलचस्प रही,कहा -अगर मैं बंदर हूँ तो जिस तरह हनुमान जी ने अकेले पूरी लंका में आग लगा दी थी उसी तरह मैं भी पूरी बीजेपी को अकेले धूल चटाने में सक्षम हूँ।समझ नहीं आता हरीश रावत की व्यंगात्मक हाजिरजवाबी पर उनके प्रशंसकों को गर्व होना चाहिए या इन बेतुकी बहस पर हँसना चाहिए।
24 मार्च को नैनीताल रोड स्थित भाजपा के चुनाव कार्यालय के उद्घाटन पर पूर्व मुख्यमंत्री कोश्यारी ने ‘हरदा’ को ‘हारदा’ कहकर निशाना साधा था। इस पर हरीश रावत ने भी कोश्यारी को ‘उज्याड़ खाणी बल्द’ बताया था। पहाड़ की खेती किसानी में रचे बसे इस बैल की आदत ही यह होती है कि वह जहां हरी भरी फसल देखता है, वहां मुंह मारने चल पड़ता है। दूसरी ओर अकेला बंदर भी पहाड़ के ठेठपन को अपने में समेटे हुए हैं। यह बंदर झुंड से दूर ही रहता है और सामान्य रूप से अन्य बंदरों की तुलना में अधिक कटखना माना जाता है। दोनों ही नेता एक-एक बार प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हैं और पहाड़ की लोक संस्कृति में रचे बसे हैं।परन्तु फिर भी छोटे अबोध बालकों की तरह लड़ने से बाज नहीं आ रहे है।
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