Nainital-Haldwani News

उपद्रवियों के चंगुल से मानवता को खींच लाया, मैं हल्द्वानी का गांधीनगर हूं…


Haldwani news: Banbhulpura violence: Gandhinagar became an example of humanity: मैं कुमाऊं के प्रवेश द्वार हल्द्वानी का गांधीनगर हूं… जो नहीं जानते उन्हें बता दूं, मेरे भीतर दाखिल होने के तीन प्रमुख रास्ते हैं। एक मंगलपड़ाव से दूसरा पाल कॉम्पेल्स के सामने से और तीसरा छतरी चौराहे से… मेरे भीतर सैकड़ों परिवार सालों से जिंदगी गुजर बसर कर रहे हैं। लेकिन जो वारदात आठ फरवरी की देर शाम मेरे से सटे इलाके मलिक का बगीचा और बनभूलपुरा में हुई, वो देखकर मैं अवाक रह गया। रहता भी क्यों नहीं, मैं गांधीनगर हूं। मैंने हमेशा सच्चाई और मानवता का साथ दिया है।

उस दिन भी कुछ ऐसा ही किया। मेरी आंखों के सामने मेरी सड़क से होते हुए कई कानून के रखवाले पुलिसकर्मी और कलम के सिपाही पत्रकार अपना फर्ज निभाने के लिए निकले थे। शाम करीब चार बजे सभी बेखौफ होकर मेरी सड़कों से होते हुए मलिक के बगीचे के आसपास पहुंचे थे। लेकिन कुछ ही देर के बाद जब उन पर नुकीले पत्थर, पेट्रोल बम और भद्दी भद्दी गालियां बरसने लगीं तो वो सारे अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे। एक तो शाम का अंधेरा, ऊपर से लाइट गुल…. मैं गांधीनगर बेबस होकर दूर से अपने पुलिसकर्मी भाई बहनों, प्रशासन के अधिकारियों और पत्रकार साथियों पर होते इस जुल्म को देख रहा था। सरकारी गाड़ियों के साथ-साथ जब मेरे पत्रकार भाईयों की स्कूटी और मोटरसाइकिल जल रही थीं तब वो काला धुंआ आसमान के साथ-साथ मेरे हिस्से से भी गुजरा था।

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आठ फरवरी की वो शाम, जब हर तरफ चीखपुकार थी। इंसानियत के दुश्मनों ने मजहबी आड़ में न कानून की परवाह की और न हीं इंसानी जान की। लेकिन मुझे फक्र है कि मेरे गांधीनगर के वासिंदों ने अपना फर्ज बखूबी निभाया। मैं यह बात पूरी ईमानदारी से कह सकता हूं कि अगर उस रात मेरे जाबांज बेटे बेटियां मददगार बनकर सड़कों पर नहीं आए होते तो न जाने कितने ही बेकसूर लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ जाता। मुझे अच्छे से याद है कि आठ फरवरी की उस शाम, कई पत्रकार और पुलिसकर्मी उपद्रवियों के पत्थरों से चोटिल हो गए थे। तब मेरे गांधीनगर के लोगों ने उन्हें अंधेरे रास्तों से बाहर निकाला और किसी तरह बरेली रोड तक लेकर आए। कई पुलिसकर्मियों और पत्रकार साथियों का गला दहशत के उस माहौल में भागते भागते सूख गया था, उन्हें आराम से बैठाकर मेरे गांधीनगर के लोगों ने पानी भी पिलाया। जिसके शरीर से खून बह रहा था, उसकी मरहम पट्टी भी की।

इतना ही नहीं बचाव में मेरे लोगों ने दहशतगर्दों पर पत्थर भी बरसाए। दहशतगर्दों की अक्ल ठिकाने लगाने के लिए हर वो काम किया जो उस वक्त बन पड़ा। मुझे अपने नाम गांधीनगर होने और मेरे वाशिंदों पर हमेशा से नाज है, क्योंकि जिस इंसानियत की दरकार उस रात थी, उसे मेरे लोगों ने बखूबी निभाया। रही बात श्रेय देने या लेने की तो गांधीनगर को इसकी न जरुरत है और न ही कभी पड़ेगी। आठ फरवरी की रात मेरे गांधीनगर के लोगों ने कुछ नया नहीं किया, उन्होंने वही किया जो मानवता का फर्ज था। काश, इंसानियत का यह फलसफा वो लोग भी समझ पाते जो हमेशा मजहब के नाम पर मरने मारने पर उतारू रहते हैं। उपद्रवियों को इस बात से भी फर्क नहीं पड़ता कि जिन पर वो लोग पत्थरों और पेट्रोल बम से हमला कर रहे हैं, उन लोगों के भी परिवार हैं। घर में कोई मां, पत्नी, बहन, बच्चा उनका भी इंतजार कर रहा है। किसी कलमकार ने क्या खूब कहा है… जब मोहब्बत लिखी हुई है गीता और कुरान में, फिर ये कैसा झगड़ा हिंदू और मुसलमान में…लोग पढ़ लिखकर हिंदू और मुसलमान हो गए, मैं ठहरा अनपढ़ इंसान ही रह गया…फिर ना कोई हिंदू रहता है ना मुसलमान रहता है, वतन पर मिटने को तैयार सारा हिंदुस्तान रहता है, किसी को हिंदू, किसी को मुसलमान पसंद है, मैं छोटा आदमी हूं, मुझे हिंदुस्तान पसंद है…

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