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नैनीताल और हरिद्वार लोकसभा सीट से सपा अकेले लड़ेगी चुनाव, INDI गठबंधन को एक और झटका


Loksabha Update: Uttarakhand Loksabha Update: Uttarakhand Election Latest Update:

2024 लोकसभा चुनाव के लिए अब लगभग दो ही महीने का समय शेष रह गया है। ऐसे में बड़े विपक्षी दल अपनी साख और वर्चस्व के लिए भाजपा को सीधी चुनौती देने के साथ जीत प्राप्त करने के लिए हर संभव प्रयास करते हुए भी नज़र आ रहे हैं। कांग्रेस अपने INDI गठबंधन के सहयोगी दलों के साथ उत्तरप्रदेश समेत अन्य 6 राज्यों में सीट समझौता कर चुकी है और अपनी पहली सूची में 39 उम्मीदवारों के नामों की घोषणा भी कर चुकी है। हालांकि उत्तराखंड में शुरुआत से ही भाजपा से कांग्रेस की सीधी टक्कर रही है लेकिन उत्तरप्रदेश में कांग्रेस को 17 सीट देने के बाद सपा ने उत्तराखंड की 5 में से 2 सीटों पर अपने उम्मीदवारों को चुनाव लड़ाने का फैसला किया है। वह दो सीटें नैनीताल-उधम सिंह नगर और हरिद्वार की है।

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रविवार को रुद्रपुर सिटी क्लब में समाजवादी पार्टी की प्रदेश कार्य समिति की बैठक में सपा प्रदेश अध्यक्ष शम्भू प्रसाद पोखरियाल की अध्यक्षता में आयोजित बैठक में उत्तराखंड की इन दोनों सीटों से चुनाव लड़ने का प्रस्ताव पास हुआ। पोखरियाल ने सभी सपा कार्यकर्ताओं से आगामी लोकसभा चुनाव के लिए कमर कसने की बात कही। बैठक में सपा ने प्रदेश में अपनी मौजूदा स्थिति पर विमर्श करते हुए अपने सभी नेताओं-कार्यकर्ताओं की राय ली और नेतृत्वकर्ताओं के मार्गदर्शन के बाद यह निर्णय लिया। इस बैठक में मुलायम सिंह यादव युथ ब्रिगेड के राष्ट्रीय महासचिव अरविन्द यादव, उत्तराखंड प्रभारी अब्दुल मतीन सिद्दीकी, प्रदेश महासचिव संजय सिंह, आदि उपस्थित रहे।

आगामी लोकसभा चुनाव में सपा उत्तराखंड की दो सीटों से यह चुनाव स्वतंत्र होकर लड़ेगी। इस बात से कांग्रेस खेमे में भी हलचल है हालांकि उत्तराखंड में कांग्रेस भाजपा को अकेले टक्कर देने में सक्षम नज़र आती है लेकिन सपा उनके INDI गठबंधन की सहयोगी दल है। ऐसे में उत्तरप्रदेश में साथ चुनाव लड़ने और उत्तराखंड की दो सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने से सपा जनता के बीच सनशय और सवालों को ही बढ़ाने का काम करेगी। इस निर्णय से ना INDI गठबंधन को कुछ लाभ होगा और नाही कांग्रेस को ख़ुशी।

सूत्रों की मानें तो बसपा भी उत्तराखंड की 5 सीटों से अपने उम्मीदवार भी चुनावी रण में उतार सकती है। सरकार को चुनौती देने वाली कांग्रेस इस समय अपने ही सहयोगी दलों और अपने ही नेताओं के वियोग से घिरी नज़र आ रही है। अब देखना यह है कि क्या कांग्रेस इन सभी मुश्किलों में उलझी रहती है या कोई चमत्कार कांग्रेस का ध्यान दोबारा चुनाव कि तरफ खींच सकता है।

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