
Uttarakhand | Nikahnama | Draft | Uniform Civil Code : उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू होने के बाद अब निकाहनामे की व्यवस्था को बेहतर बनाने की तैयारी की जा रही है। उत्तराखंड वक्फ बोर्ड इस दिशा में काम कर रहा है। प्रस्ताव के तहत निकाह कराने वाले काजी और मौलवियों का पंजीकरण करने, निकाह से जुड़े दस्तावेजों को व्यवस्थित रखने और गवाहों की जानकारी दर्ज करने जैसे मुद्दों पर विचार किया जा रहा है।

सरकार और वक्फ बोर्ड का कहना है कि इस पहल का उद्देश्य निकाह की प्रक्रिया में पारदर्शिता लाना और महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करना है। हालांकि प्रस्तावित व्यवस्था के अंतिम नियम और इसे लागू करने की प्रक्रिया अभी स्पष्ट होनी बाकी है।
उत्तराखंड के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री खजान दास ने कहा कि सरकार निकाहनामे को अधिक मजबूत और व्यवस्थित बनाने की दिशा में काम कर रही है। इसके लिए निकाह कराने वाले काजी और मौलवियों के पंजीकरण पर विचार किया जा रहा है।
मंत्री ने कहा अगले दो से तीन महीने में इस संबंध में प्रक्रिया और अधिक जानकारी सामने आ सकती है। प्रस्तावित निकाहनामे को राज्य में लागू UCC के अनुरूप तैयार करने की बात भी कही जा रही है।
उत्तराखंड वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष शादाब शम्स के अनुसार, निकाह कराने वाले काजी या मौलवी की पहचान दर्ज करने के साथ निकाह के दौरान मौजूद गवाहों की जानकारी भी स्पष्ट रूप से दर्ज करने की व्यवस्था बनाई जा सकती है।
प्रस्ताव में काजी और मौलवियों को विशिष्ट पहचान संख्या देने की बात शामिल है। इसके अलावा गवाहों के पहचान पत्र और पते का विवरण दर्ज करने पर भी विचार किया जा रहा है। इससे निकाह से जुड़े दस्तावेजों का रिकॉर्ड व्यवस्थित रखने और संभावित धोखाधड़ी को रोकने में मदद मिलने की उम्मीद है।
वक्फ बोर्ड की ओर से निकाहनामे को UCC पोर्टल से जोड़ने की संभावना पर भी काम किया जा रहा है। इससे निकाह से संबंधित रिकॉर्ड दर्ज करने और विवाह प्रमाणपत्र प्राप्त करने की प्रक्रिया आसान हो सकती है। हालांकि इन व्यवस्थाओं को लेकर अंतिम निर्णय और औपचारिक नियम सामने आना बाकी है।
वक्फ बोर्ड अध्यक्ष शादाब शम्स ने निकाह, तलाक और महिलाओं के अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर भी जोर दिया है। उनका कहना है कि वैवाहिक संबंधों से जुड़े नियमों का पालन सुनिश्चित करना और महिलाओं के साथ होने वाले शोषण को रोकना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि महिलाओं को इद्दत के नाम पर जबरदस्ती का सामना नहीं करना चाहिए। इस तरह की शिकायतों को रोकने के लिए हेल्पलाइन शुरू करने की बात भी कही गई है। हालांकि हेल्पलाइन कब शुरू होगी और इसकी कार्यप्रणाली क्या होगी….इस बारे में विस्तृत जानकारी सामने आनी बाकी है।
शादाब शम्स ने यह भी कहा कि UCC में बेटियों और बेटों को संपत्ति में समान अधिकार दिए गए हैं। उनके मुताबिक इन प्रावधानों से महिलाओं को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होने और उन्हें मजबूत करने में मदद मिल सकती है।
अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री खजान दास का कहना है कि निकाहनामे को लेकर सरकार की पहल व्यवस्था को मजबूत बनाने के उद्देश्य से की जा रही है। उन्होंने UCC लागू होने का उदाहरण देते हुए कहा कि शुरुआत में इसके विरोध की आशंका जताई गई थी…लेकिन सरकार ने इसे लागू किया।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में उत्तराखंड देश का पहला राज्य बना, जहां समान नागरिक संहिता लागू की गई। अब निकाहनामे से जुड़ी प्रक्रिया को भी व्यवस्थित करने की तैयारी को इसी दिशा में अगला कदम माना जा रहा है।
उत्तराखंड वक्फ बोर्ड के अधिवक्ता एससी बिरमानी इस पहल के कानूनी पहलुओं पर काम कर रहे हैं। उनका कहना है कि वक्फ बोर्ड समाज और सरकार के बीच समन्वय की भूमिका निभा रहा है।
उनके मुताबिक प्रस्तावित व्यवस्था का उद्देश्य किसी समुदाय या व्यक्ति के खिलाफ काम करना नहीं, बल्कि निकाह से जुड़ी प्रक्रिया को बेहतर बनाना है। निकाहनामे को UCC पोर्टल से जोड़ने की संभावना पर भी विचार किया जा रहा है। इससे दस्तावेजों का रिकॉर्ड रखने और विवाह प्रमाणपत्र से संबंधित प्रक्रिया को सरल बनाने में मदद मिल सकती है।
इस्लामिक जानकार और पत्रकार मोहम्मद शाहनज़र ने कहा कि मुस्लिम समाज में निकाह के दौरान पहले से ही कई जगह रजिस्टर में जरूरी जानकारियां दर्ज की जाती हैं। इनमें दूल्हा-दुल्हन के नाम, उम्र, माता-पिता का विवरण, गवाहों के हस्ताक्षर और निकाह कराने वाले मौलवी की जानकारी शामिल होती है।
उन्होंने कहा कि निकाहनामे की प्रतियां दोनों पक्षों को दी जाती हैं और जरूरत पड़ने पर इन्हें कानूनी प्रक्रिया में भी प्रस्तुत किया जा सकता है।
शाहनज़र के मुताबिक यदि सरकार इस व्यवस्था को और व्यवस्थित करती है और काजी-मौलवियों को आधिकारिक पहचान देने की प्रक्रिया बनाती है, तो इससे उन्हें भी लाभ मिल सकता है। हालांकि नए नियम बनाते समय मौजूदा प्रक्रिया और लोगों की व्यावहारिक जरूरतों का ध्यान रखना जरूरी होगा।
मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की राष्ट्रीय संयोजिका डॉ. शालिनी अली ने निकाहनामे को बेहतर बनाने की पहल का स्वागत किया है। उनका कहना है कि विवाह से जुड़े फैसलों में महिलाओं की सहमति और उनके अधिकारों को महत्व मिलना चाहिए।
उन्होंने कहा कि निकाहनामे में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए….जिससे लड़की निकाह से पहले उसमें दर्ज शर्तों को पढ़ सके, अपनी बात रख सके और जरूरी बदलावों पर चर्चा कर सके। इससे महिलाओं को विवाह से जुड़े फैसलों में अपनी सहमति व्यक्त करने का अवसर मिल सकता है।
हालांकि प्रस्तावित निकाहनामे में किन शर्तों को शामिल किया जा सकेगा और उन्हें किस तरह की कानूनी मान्यता मिलेगी….यह अंतिम नियम जारी होने के बाद ही स्पष्ट होगा।
उत्तराखंड में निकाहनामे को लेकर शुरू हुई यह कवायद कानूनी और सामाजिक, दोनों लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। एक ओर सरकार और वक्फ बोर्ड इसे दस्तावेजों में पारदर्शिता लाने तथा महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करने की कोशिश बता रहे हैं। दूसरी ओर इस मुद्दे का संबंध धार्मिक परंपराओं और मुस्लिम समाज की मौजूदा निकाह प्रक्रिया से भी है।
आगामी विधानसभा चुनाव से पहले इस पहल के राजनीतिक मायने भी निकाले जा रहे हैं। हालांकि इसका वास्तविक असर नए नियमों, उनकी कानूनी स्थिति और आम लोगों के लिए प्रक्रिया कितनी आसान रहती है, इस पर निर्भर करेगा।
फिलहाल निकाहनामे के नए स्वरूप और पंजीकरण की व्यवस्था को लेकर अंतिम तस्वीर सामने आना बाकी है। सरकार की ओर से प्रक्रिया स्पष्ट होने के बाद ही पता चलेगा कि प्रस्तावित बदलाव किस तरह लागू किए जाएंगे।



