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जिस आवास से परहेज करते रहे दिग्गज, वहीं रहते हुए फिर मुख्यमंत्री बने धामी

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देहरादून: कुछ मिथक, मिथक से ज्यादा अंधविश्वास से लगने लगते हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि आजतक जो भी मुख्‍यमंत्री न्यू कैंट रोड स्थित नए मुख्यमंत्री आवास में रहने आया है, उसे सीएम की कुर्सी से हाथ धोना पड़ा है। लेकिन पुष्कर सिंह धामी ने मुख्यमंत्री बनने के साथ साथ इस मिथक या अंधविश्वास को भी तोड़ दिया है। ये सिलसिला इस भवन के बनने के साथ ही शुरू हो गया था। पहले खंडूड़ी, फिर निशंक और बहुगुणा, सभी को इस आवास ने अच्छे परिणाम नहीं दिए। यही कारण था कि हरीश रावत तो इस आवास से दूर ही रहे।

गौरतलब है कि पुष्कर सिंह धामी खटीमा सीट से विधानसभा चुनाव हारकर भी भाजपा की नैया पार लगाने में कामयाब रहे। जिस वजह से उन्होंने पार्टी का भरोसा जीता और पार्टी ने उन्हें दोबारा मुख्यमंत्री बनाने का फैसला किया। भाजपा विधायक दल की बैठक में उन्‍हें नेता चुना गया। अब बुधवार को उत्तराखंड के 12वें मुख्‍यमंत्री के रूप में शपथ ले रहे हैं। पुष्कर सिंह धामी ने सीएम बनने के साथ कई मिथक तोड़े हैं, लेकिन इन सबमें से सबसे खास मिथक मुख्यमंत्री आवास से जुड़ा है।

दरअसल ये कहा जाता है कि देहरादून स्थित सीएम आवास में जो मुख्यमंत्री रहने आता है। वो ज्यादा दिन तक सीएं की कुर्सी पर नहीं टिकता। लेकिन सीएम धामी ने ये कर के दिखा दिया है। शुरुआत से बात करें तो राज्य गठन से पहले यहां राज्य अतिथि गृह हुआ करता था। उत्तराखंड बनने के बाद इसे मुख्यमंत्री आवास बना दिया गया। पहले मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी और मुख्यमंत्री रहे भगत सिंह कोश्यारी ने इसे केवल कैंप कार्यालय के रूप में इस्तेमाल किया था।

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लेकिन फिर भी ये कहना होगा कि पहले विधानसभा चुनाव में भाजपा को शिकस्त मिली थी। बाद में कांग्रेस के मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी इसमें पांच साल तक रहे। फिर इसे ध्वस्त कर नई इमारत खड़ी करवाई। वास्तुकला के आधार पर करोड़ों की लागत से तैयार की गई ये इमारत तब पूरी हुई जब 2007 में भाजपा सरकार में भुवन चंद्र खंडूड़ी मुख्यमंत्री बने थे। खंडूड़ी अपने परिवार के साथ यहां रहे, लेकिन बीच में ही उन्हें मुख्‍यमंत्री पद छोड़ना पड़ा। 

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उनके बाद सत्ता संभालने की जिम्मेदारी मुख्यमंत्री डाक्‍टर रमेश पोखरियाल निशंक को मिली है। उनके साथ भी वही हुआ। निशंक को भी कुर्सी से हाथ धोना पड़ा। हालांकि जब खंडूड़ी दोबारा सीएम बने तो उन्होंने इस आवास को केवल कार्यालय के रूप में इस्तेमाल किया। इसके बावजूद 2012 के चुनाव में भाजपा को सत्ता गंवानी पड़ी। कांग्रेस की सरकार आई तो मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा आवास में रहने आए। दो सालों के बाद उनसे भी कुर्सी छिन गई। फिर इस मिथक को इतनी तूल मिली कि मुख्यमंत्री बने हरीश रावत ने इस आवास से दूरी बनाए रखी।

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हालांकि फिर भी वर्ष 2017 में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई। भाजपा की सरकार बनी तो त्रिवेंद्र सिंह रावत को सीएम बनाया गया। उन्होंने इस मिथक को तोड़ने के लिए वास्तुशास्त्र का भी सहारा लिया लेकिन इसके बाद भी भाजपा ने एक साल में तीन मुख्यमंत्री बदल डाले। फिर जब पुष्‍कर सिंह धामी मुख्‍यमंत्री बने तो वह इस आवास में रहने लगे। 2022 के विधानसभा चुनाव में वह अपनी सीट से हार गए, लेकिन मुख्यमंत्री की दौड़ में जीत गए। ऐसा में ये कहना होगा कि धामी ने बतौर मुख्यमंत्री इस मिथक को भी तोड़ दिया।

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