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जिस रैणी गांव ने शुरू किया था पर्यावरण बचाव आंदोलन, उस पर कुदरत ने बरपाया कहर


हल्द्वानी: प्रदेश में कुदरत की मार एक बार फिर देखने को मिली है। रविवार को चमोली जिले में आई त्रासदी ने फिर देवभूमि को रोने पर मजबूर कर दिया। चमोली के के रैणी गांव के समीप ग्लेशियर टूटने से भारी तबाही हुई है। आपदा भले चमोली के एक इलाके से शुरू हुई हो। मगर इसका अलर्ट उत्तराखंड से लेकर उत्तर प्रदेश तक के कई जिलों में घोषित कर दिया गया है। चिपको आंदोलन तो आपको याद ही होगा। यह वही रैणी गांव है, जहां पर्यावरण संरक्षण का सबसे बड़ा आंदोलन हुआ था। रैणी गांव से ही ऐतिहासिक चिपको आंदोलन की शुरुआत हुई थी।

यह रैणी गांव चमोली जिले के जोशीमठ ब्लॉक मुख्यालय से 26 किलोमीटर दूर स्थित है। यहीं से चिपको आंदोलन की शुरुआत हुई थी। सन 1973 में रैणी गांव की ही गौरा देवी के मार्गदर्शन में पेड़ों को बचाने के लिए यह आंदोलन शुरू किया गया था। गौरा देवी के नेतृत्व में कई महिलाएं और काफी सारे लोग आगे आया था। चिपको आंदोलन में पेड़ों को बचाने के लिए यह सभी जाकर उनसे चिपक गए थे।

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यह चिपको आंदोलन ही था, जिसने पूरे विश्व को पर्यावरण संरक्षण के बारे में संदेश दिया था। ऐसे में आंदोलन की जिस भूमि से पूरी दुनिया को इतनी अहम संदेश मिला, आज वही गांव एकबार फिर सुर्खियों में है। लेकिन आज इस गांव के चर्चा में आने की वजह दूसरी है। इस बार यहां आपदा आई है। ग्लेशियर फटने की प्राकृतिक आपदा। लोग डर में हैं, मलबों में दबे हुए लोग ज़िंदगी की भीख मांग रहे हैं।  

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गांव के करीब स्थित ऋषि गंगा पावर प्रोजेक्ट तबाह हो गया है। इस प्रोजेक्ट को काफी नुकसान पहुंचा है। रैणी गांव के समीप फटे ग्लेशियर का मलबा अलकनंदा और धौलीगंगा नदी में बह रहा है। इस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे करीब कई मजदूर लापता बताए जा रहे हैं। कई लोगों को रेस्क्यू टीमों ने सही सलामत बाहर निकाल लिया है तो कई लोग मौत से लड़ाई हार गए हैं। रैणी गांव के समीप फटे ग्लेशियर का मलबा अलकनंदा और धौलीगंगा नदी में बह रहा है। प्रशासन, पुलिस, वैज्ञानिक अपनी राय दे रहे हैं अथवा अपना काम कर रहे हैं। स्थिति मुश्किल है।

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