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उत्तराखंड के पहाड़ी जिलो में रहने वाले हर 5वें शख्स को है अनिद्रा नामक बीमारी,ये हैं लक्ष्यण

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देहरादून: पहाड़ों में आपने सुना होगा कि लोग मैदान के मुकाबले ज्यादा काम करते हैं। वह ज्यादा काम करते हैं और कम होते हैं। अधिकतर हम सुनते हैं कि पहाड़ों में लोग जल्दी उठते हैं। ये उनकी सेहत पर प्रभाव डाल रहा है। ऐसा एक अध्ययन में सामने आया है।

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अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) ऋषिकेश के विशेषज्ञ चिकित्सकों को अध्ययन में पहाड़ में रहने वाले लोगों की सेहत के बारे में जरूरी जानकारी मिली है। पहाड़ में रहने वाले हर पांचवे व्यक्ति को अनिद्रा व निंद्रा से जुड़ी बीमारी है। विशेषज्ञ चिकित्सकों के अध्ययन में सामने आया है कि 2000 समुद्र तल की ऊच्चाई वाले इलाकों में रहने वाले लोगों में नींद की समस्या देखी गई है।

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उनकी नींद की गुणवत्ता मैदानी क्षेत्रों में रह रहे लोगों से भी खराब है। इस बीमारी से अगर कोई ग्रस्त हैं तो उसे ऑक्सीजन की कमी के कारण श्वांस में अनियमितता, सांस की गति बढ़ जाना एवं सांस की गति का कम हो जाना, सोने के दौरान पैरों में बेचैनी, बार-बार नींद से दिमाग का जग जाना, नींद संबंधी विचार का बार-बार आना लक्ष्यण दिखाई देते हैं।

एम्स के मनोचिकित्सा विभागाध्यक्ष डॉ. रवि गुप्ता ने विश्वभर में लगभग 14 करोड़ लोग पहाड़ी इलाकों में रहते हैं। वहीं चार करोड़ लोग पहाड़ों की यात्रा करते हैं। भारत में भी लगभग पांच से छह करोड़ लोग पहाड़ों में रहते हैं। उन्होंने बताया कि रक्त में ऑक्सीजन की कमी होने पर दिमाग के बार-बार जगने के अलावा दूसरी परेशानी रेस्ट लेस लेग सिंड्रोम भी देखने को मिली है।

यह बीमारी पहाड़ों में रहने वाले दस में से एक व्यक्ति में देखी जाती है। उन्होंने बताया कि अगर कोई अससे ग्रस्त है तो पैरों में बड़ी बेचैनी होती है। यह बेचैनी पिंडलीयों (मांस वाले भाग) में होती है। इस बीमारी में आराम पाने के लिए मरीज पैरों या पंजों को बार-बार हिलाता रहता है, जिससे उसकी नींद गहरी नहीं हो पाती और नींद बार-बार टूट जाने जैसे लक्ष्यण देखने को मिलते हैं। अच्छी गुणवत्ता व आराम की नींद मौजूदा भागदौड़ भरे जीवन में जरूरी है। उन्होंने सुझाव दिया है कि, नींद की मात्रा समयावधि की बजाय नींद की गुणवत्ता पर लोगों का फोक्स रहना चाहिए।

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